महेंद्रगढ़
भारत की संस्कृति में मेलों का विशेष महत्व रहा है। कुंभ जैसे विशाल मेले से लेकर गांव-गांव में लगने वाले छोटे-बड़े मेले सदियों से सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। महेंद्रगढ़ क्षेत्र में भी यह परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है। मौदा वाली में शिव का मेला, बाघोत धाम पर लगने वाला मेला, बाबा केसरिया का मेला और बाबा जयरामदास धाम पाली का मेला क्षेत्र की आस्था और संस्कृति के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
हर वर्ष 14 जनवरी को लगने वाला बाबा जयरामदास धाम पाली का मेला अपने बेहतर प्रबंधन, खेल गतिविधियों और खिलाड़ियों के संगम के लिए विशेष पहचान रखता है। यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। मेले से लंबे समय से जुड़े कैलाश पाली, दशरथ सिंह, रणवीर सिंह, नरेश सिंह और वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि यह मेला पिछले 78 वर्षों से लगातार आयोजित होता आ रहा है। प्रारंभिक दौर में जहां श्रद्धालुओं की संख्या कम होती थी, वहीं समय के साथ इसमें निरंतर वृद्धि हुई है।
पहले मेले में कुश्ती और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल ही मुख्य आकर्षण होते थे, जबकि वर्तमान समय में क्रिकेट, वॉलीबॉल, लड़कियों की कबड्डी और विभिन्न प्रकार की दौड़ भी मेले का हिस्सा बन चुकी हैं। खेलों में आधुनिकता आई है, जहां क्रिकेट अत्यधिक लोकप्रिय हुआ है, वहीं कबड्डी अब मैट पर खेली जाने लगी है और कुश्ती के लिए भी समय निर्धारित किया गया है।
पुराने समय में यह मेला महिलाओं और पुरुषों के लिए प्रमुख मनोरंजन का साधन हुआ करता था। महिलाओं के लिए मानव-चलित झूले आकर्षण का केंद्र होते थे। मेले से मैलखोरा, सीपी, खुरचनी, हारी, कपड़े के ऊंट-घोड़े, पलटा और कड़ाही जैसी वस्तुएं खरीदी जाती थीं। समय के साथ इनका स्थान इलेक्ट्रिक झूलों, आइसक्रीम, चिप्स और रबर के खिलौनों ने ले लिया है। खाने-पीने में जहां पहले जलेबी प्रमुख थी, वहीं अब नमकीन, समोसे और पकौड़ी अधिक बिक रही हैं।
कभी दूर-दराज से किसान ऊंटगाड़ी और ट्रैक्टरों में गन्ना लेकर मेले में आते थे और श्रद्धालु एक रुपये में चार ताड़ लेकर घर जाते थे, आज उसकी जगह जूस ने ले ली है। पहले जहां रिश्तेदार दो दिन पहले गांव पहुंच जाते थे, वहीं अब समय के अभाव में कुछ घंटों के लिए ही बाबा के दर्शन करने आते हैं। ऊंटगाड़ी, ट्रैक्टर और पैदल आने वालों की जगह अब मोटरसाइकिल, बस और कार ने ले ली है।
इन सभी बदलावों के बावजूद बाबा जयरामदास के प्रति श्रद्धा लगातार बढ़ रही है। पहले जो मेला केवल एक दिन लगता था, अब तीन दिन तक निरंतर भीड़ रहती है और खेल प्रतियोगिताएं 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। मंदिर का भव्य स्वरूप, सुंदर प्रकाश व्यवस्था और भंडारों का प्रसाद श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। बाबा जयरामदास धाम पाली का मेला आज भी संस्कृति, खेल और आस्था का सजीव संगम बनकर क्षेत्र की पहचान को और मजबूत कर रहा है।

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