महेंद्रगढ़
आज से 82 वर्ष पूर्व समाधि लेने वाले संत बाबा जयरामदास के प्रति गांव पाली और आसपास के क्षेत्र के लोगों की श्रद्धा समय के साथ और अधिक गहरी होती गई है। रोजगार और व्यवसाय के कारण वर्षों पहले गांव छोड़कर देश-विदेश में बस चुके लोग भी बाबा जयरामदास और अपने पैतृक गांव से कभी दूर नहीं हो पाए। उन्होंने अपने गांव को “मेरा गांव, मेरा तीर्थ” मानते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाबा के आश्रम, मेले और गांव की आवश्यकताओं के लिए लगातार योगदान दिया है। यही कारण है कि बाबा जयरामदास का धाम आज आस्था, सेवा और सामाजिक सरोकारों का बड़ा केंद्र बन चुका है।
बाबा के मेले की शुरुआत के बाद पहली बार बाबा की तस्वीर और मेले की सूचना वाले पर्चे छपवाने की पहल दिल्ली में कारोबार करने वाले पंडित किशन लाल भगवत प्रसाद ने की। यह छोटा सा प्रयास आगे चलकर एक परंपरा बन गया। करीब 40 वर्ष पहले सेठ मदनलाल पुत्र बुद्धराम के सुपुत्रों ने गांव के बस स्टैंड पर मुख्य द्वार का निर्माण करवाकर बाबा के आश्रम की शोभा बढ़ाई। यह द्वार आज भी श्रद्धालुओं का स्वागत करता है और सेवा भावना का प्रतीक बना हुआ है।
करीब 38 वर्ष पूर्व पंडित सूरजमल नानी बाई ट्रस्ट के संचालकों ने गांव के बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक विद्यालय की इमारत का निर्माण करवाया। इसी ट्रस्ट की ओर से बाबा के मंदिर परिसर में एक विशाल भवन भी बनवाया गया, जिससे दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा मिल सकी। सूरजमल के पुत्रों ने हैदराबाद में भी बाबा जयरामदास का मंदिर बनवाया, जिससे बाबा की ख्याति और श्रद्धा का विस्तार देश के अन्य हिस्सों तक हुआ
पिछले 28 वर्षों से बाबा के मेले में सुंदर और भव्य प्रकाश व्यवस्था करने वाले विजय कुमार नांगलिया का परिवार भी वर्ष 1940 के आसपास गांव छोड़कर बंगाल चला गया था। बावजूद इसके बाबा में उनकी आस्था बनी रही। उनके परिवार की ओर से मंदिर परिसर में फव्वारा लगवाना, मंदिर द्वार पर विशाल प्रतिमा स्थापित करना, धर्मशाला की चारदीवारी और पक्षी घर का निर्माण जैसे कई उल्लेखनीय कार्य करवाए गए। इसी तरह सत्यनारायण अग्रवाल के सुपुत्र सुरेश की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी द्वारा आमजन के लिए मैरिज पैलेस बनवाया गया, जो समाज सेवा का प्रेरणादायक उदाहरण है।
वर्ष 1937 में जैसी राम की स्मृति में शील चंद और कैलाश चंद द्वारा निर्मित कुएं का पुनरुद्धार उनके पौत्र मोहनलाल अग्रवाल ने करवाया। इंडोनेशिया में कारोबार कर रहे इस परिवार ने पुराने कुएं को नया स्वरूप देकर उसे सुंदर और उपयोगी स्थल के रूप में विकसित किया। इस कुएं से लगभग 50 वर्षों तक पशुओं के लिए मीठे पानी की व्यवस्था की जाती रही। वहीं सेठ माधव प्रसाद के पुत्रों ने गांव में कन्या विद्यालय का निर्माण करवाकर बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया। बाबा लालदास की स्मृति में बन रहे पार्क में सेठ बनवारी लाल और ग्यारसी लाल के पुत्रों का भी योगदान रहा है। इसके अलावा अनेक प्रवासी ग्रामीणों ने धर्मशाला में कमरों का निर्माण करवाया, जबकि वर्ष 1947 में लाला मूलचंद के सुपुत्रों ने गांव में एक सुंदर धर्मशाला बनवाकर समाज को समर्पित की।
समय के साथ बाबा जयरामदास का मेला भी व्यापक होता चला गया। आज इस मेले में लाखों श्रद्धालु बाबा की समाधि पर नतमस्तक होकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। बाबा का यह धाम अब केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति और पक्षी प्रेमियों के लिए भी विशेष पहचान बन चुका है। गांव के पूर्व में स्थित ब्राह्मण वाला जोहड़, उसके चारों ओर लगे इंदोख, जाल और पीपल के सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ पर्यावरण प्रेमियों के लिए शोध का विषय हैं। जोहड़ के भीतर स्थित पीपल के पेड़ की परिक्रमा कर श्रद्धालु पुण्य अर्जित करते हैं।
मंदिर के पीछे बना 73 फीट ऊंचा और 9 मंजिला पक्षी घर इस धाम की अलग पहचान है। यहां 3600 पक्षियों के लिए घोंसलों की व्यवस्था की गई है। वर्ष 2022 में विजय नलिनी नांगलिया, सज्जन शर्मा, रोहतास अग्रवाल, आनंद शर्मा और आचार्य कमलकांत के सहयोग से इस पक्षी घर का निर्माण पूरा हुआ। पक्षी घर का डिजाइन वातावरण के अनुरूप तैयार किया गया है, जिसके चलते पूरे वर्ष यहां पक्षियों की चहचहाहट बनी रहती है। कैलाश पाली बताते हैं कि पुराने मंदिर की दीवारों में भी मिट्टी के बर्तन लगाकर पक्षियों के घोंसले बनाए जाते थे, जिससे पूर्वजों की प्रकृति के प्रति जागरूकता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
आज बाबा जयरामदास का आश्रम और मेला श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है। यहां आने वाला श्रद्धालु न केवल अपनी आस्था की पूर्ति करता है, बल्कि जीव-जंतुओं और पर्यावरण के संरक्षण का संकल्प भी लेकर लौटता है। बाबा जयरामदास का धाम यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है, जो समाज और प्रकृति दोनों के कल्याण से जुड़ी हो।





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