महेंद्रगढ़
खंड के गांव आकोदा स्थित बाबा साध धाम में आज विशाल मेले का आयोजन किया गया, जिसमें क्षेत्रभर से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। श्रद्धालुओं ने बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर प्रसाद ग्रहण किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मेले के दौरान धाम परिसर श्रद्धा और भक्ति के माहौल से सराबोर नजर आया।
मेले में बच्चों और महिलाओं की विशेष चहल-पहल देखने को मिली। बच्चों ने जहां खिलौनों और झूलों का आनंद लिया, वहीं महिलाएं पूजा सामग्री, घरेलू सामान और अन्य दुकानों पर खरीददारी करती दिखीं। मेले को लेकर गांव और आसपास के क्षेत्रों में उत्साह का माहौल रहा।
आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र
बाबा साध धाम क्षेत्रवासियों के लिए आस्था और श्रद्धा का एक प्रमुख केंद्र है। आकोदा सहित आसपास के दर्जनों गांवों—खुडाना, गढ़ी, ढाणी मालियान, बास खुडाना, आदलपुर और भूरजट—के लोगों की गहरी आस्था इस धाम से जुड़ी हुई है। लोग अपने जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों और धार्मिक अनुष्ठानों में बाबा साध धाम को अवश्य स्मरण करते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब भी किसी घर में नई गाय या भैंस आती है, तो उसका प्रथम दूध और दही बाबा को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि जो मवेशी दूध नहीं देता, वह बाबा के धाम में भोग लगाने के बाद दूध देने लगता है। भक्तों का मानना है कि बाबा की कृपा से रोग और शोक दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
साल में तीन बड़े मेले
धाम पर शुक्ल पक्ष की प्रत्येक द्वादशी को मेला लगता है, जिसमें मीठे चावल का प्रसाद वितरित किया जाता है और हर घर में खीर-चूरमा का भोग लगाया जाता है। मंदिर कमेटी के सदस्यों के अनुसार, बाबा साध धाम में साल में तीन बड़े मेले और भंडारे आयोजित किए जाते हैं।
पहला मेला मकर संक्रांति के अवसर पर, दूसरा श्रावण मास की द्वादशी को और तीसरा 16 दिसंबर को बाबा की मूर्ति स्थापना दिवस पर आयोजित होता है। मकर संक्रांति के मेले के दौरान क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से टीमें भाग लेती हैं।
बाबा साध धाम का इतिहास
क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार, विक्रमी संवत 1584 फाल्गुन शुक्ला एकादशी, सन 1528 में साधु हरिदास गांव के जोहड़ की पाल पर आकर रहने लगे थे। द्वादशी के दिन उन्होंने एक शमी वृक्ष की सूखी छड़ी जोहड़ के पास लगाकर धूनी रमाई। कुछ ही दिनों में वह सूखी टहनी हरी-भरी हो गई, जिसे चमत्कार माना गया। इसके बाद गांववासियों ने साधु हरिदास को बाबा साध के नाम से सम्मान दिया।
बाबा हरिदास ने एक गाय का पालन किया, जिसका नाम गौरी था। उनके दो प्रमुख शिष्य तुलसीदास और मोहनदास थे, जिन्हें उच्च कोटि के सिद्ध संत माना जाता है। बाबा हरिदास और उनके शिष्यों की समाधि आज भी धाम के सरोवर की पाल पर स्थित है।
सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र
बाबा साध धाम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी केंद्र है। यहां लगने वाले मेले और भंडारे हजारों लोगों को जोड़ते हैं और भाईचारे की भावना को मजबूत करते हैं। आज आयोजित मेले ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि बाबा साध धाम क्षेत्रवासियों के लिए श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है।

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